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सच का आईना दिखाती मुनव्वर राणा साहब की ग़ज़ल

📅 21-04-2022 05:07 AM 👁 2 Readers 💬 0 Comments 🔁 0 Shares
कविता

<p>अब फ़क़त शोर मचाने से नहीं कुछ होगा।सिर्फ होठों को हिलाने से नहीं कुछ होगा।।</p>
<p>ज़िन्दगी के लिए बेमौत ही मरते क्यों हो।अहले इमां हो तो शैतान से डरते क्यों हो।।</p>
<p>तुम भी महफूज़ कहाँ अपने ठिकाने पे हो।बादे अखलाक तुम्ही लोग निशाने पे हो।।</p>
<p>सारे ग़म सारे गिले शिकवे भुला के उठो।दुश्मनी जो भी है आपस में भुला के उठो।।</p>
<p>अब अगर एक न हो पाए तो मिट जाओगे।ख़ुश्क पत्त्तों की तरह तुम भी बिखर जाओगे।।</p>
<p>खुद को पहचानो की तुम लोग वफ़ा वाले हो।मुस्तफ़ा वाले हो मोमिन हो खुदा वाले हो।।</p>
<p>कुफ्र दम तोड़ दे टूटी हुई शमशीर के साथ।तुम निकल आओ अगर नारे तकबीर के साथ।।</p>
<p>अपने इस्लाम की तारीख उलट कर देखो ।अपना गुज़रा हुआ हर दौर पलट कर देखो।।</p>
<p>तुम पहाड़ों का जिगर चाक किया करते थे।तुम तो दरयाओं का रूख मोड़ दिया करते थे।।</p>
<p>तुमने खैबर को उखाड़ा था तुम्हे याद नहीं।तुमने बातिल को पिछाड़ा था तुम्हे याद नहीं।।।</p>
<p>फिरते रहते थे शबो रोज़ बियाबानो में।ज़िन्दगी काट दिया करते थे मैदानों में।।</p>
<p>रह के महलों में हर आयते हक़ भूल गए।ऐशो इशरत में पयंबर का सबक़ भूल गए।।</p>
<p>अमने आलम के अमीं ज़ुल्म की बदली छाई।ख़्वाब से जागो ये दादरी से अवाज़ आई।।</p>
<p>ठन्डे कमरे हंसी महलों से निकल कर आओ।फिर से तपते हु सहराओं में चल कर आओ।।</p>
<p>लेके इस्लाम के लश्कर की हर एक खुबी उठो।अपने सीने में लिए जज़्बाए ज़ुमी उठो।।</p>
<p>राहे हक़ में बढ़ो सामान सफ़र का बांधो।ताज़ ठोकर पे रखो सर पे अमामा बांधो।।</p>
<p>तुम जो चाहो तो जमाने को हिला सकते हो।फ़तह की एक नयी तारीख बना सकते हो।।</p>
<p>खुद को पहचानों तो सब अब भी संवर सकता है।दुश्मने दीं का शीराज़ा बिखर सकता है।।</p>
<p>हक़ परस्तों के फ़साने में कहीं मात नहीं।तुमसे टकराए "मुंनव़र" ज़माने की ये औक़ात नहीं।।</p>
<p>शायर: मुनव्वर राणा</p>

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