ग़ज़ल: बिक गया वो शख्स आखिर कौड़ियों के दाम पर

📅 14-10-2024 02:02 PM 👁 3 Readers 💬 0 Comments 🔁 0 Shares
कविता

<p>रात की तारीकियों में रौशनी के नाम परएक दीया मैंने जला कर रख दिया है बाम पर</p>
<p>मेरे अपनों ने मुझे कुछ इस तरह रुस्वा कियामेरा दामन चाक कर डाला रफू के नाम पर</p>
<p>एक दूजे से लिपट कर रो रहे थे वालिदैनलाडले परदेश को जब भी गए थे काम पर</p>
<p>क्या बताऊँ आपको मैं अपने दिल की कैफियतइश्क़ में गुज़री है क्या - क्या इस दिल ए नाकाम पर</p>
<p>खुद को सबसे कीमती होने को था जिसको गुरूरबिक गया वो शख्स आखिर कौड़ियों के दाम पर</p>
<p>पास मेरे जीते जी रौशन कोई आया नहींआज मेला सा लगा है ज़िंदगी की शाम पर</p>
<p>अफरोज रौशन किछौछवी</p>

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