नात: जहां भी हो वहीं से दो सदा सरकार सुनते हैं
📅 24-03-2021 07:59 AM
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कविता
<p>जहां भी हो वहीं से दो सदा सरकार सुनते हैंसरे आइना सुनते हैं पसे दीवार सुनते हैं</p>
<p>मेरी हर सांस उनकी आहटों के साथ चलती हैमेरे दिल की धड़कनों की भी वह रफ़्तार सुनते हैं</p>
<p>गुनाहगारों दरूदे वालिहाना भेज कर देखोवह अपने उम्मती का नग़म-ए-किरदार सुनते हैं</p>
<p>मैं सदक़े जाऊं उनकी रहमतल्लिला़लमीनी केपुकारो चाहे जितनी बार वह हर बार सुनते हैं</p>
<p>मुज़फ्फर जब किसी महफ़िल में उनकी नात पढ़ता हैमेरा ईमान है वह भी मेरे अशआ़र सुनते हैं</p>
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