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मुहब्बतों को नफरतों मे बदल दिया तुमने

📅 07-11-2021 01:15 PM 👁 4 Readers 💬 3 Comments 🔁 0 Shares
कविता

<p>मुहब्बतों को नफरतों मे बदल दिया तुमनेफिर इंसानियत का चेहरा कुचल दिया तुमने</p>
<p>हिंदू को मुसलमान से जब जब लड़ाना चाहाहोशियारी से दांव धर्म का चल दिया तुमने</p>
<p>जब भी आईना बन जाने को हुआ ये दिलहर बार कोई रंग हिंदुत्व का मल दिया तुमने</p>
<p>तेरी इक नश्ल की खातिर इतनी नफरते है कीबाकियों में जहर मजहबो का भर दिया तुमने</p>
<p>संवैधानिक मूल्यों को कूचकर इतराते फिर रहेदेश की आबोहवा को मैला कर दिया तुमने</p>
<p>नफरतो के दांव एक दिन टूट जाएंगे देखनाहमारी मोहब्बतों में इंसानियत न देखी तुमने</p>
<p>किसी हुक्मरानी खातिर गंगा जमुनी हम न भूलेंगेचाहे लाख लड़ा और तोड़ा है इस वतन को तुमने</p>
<p>अब जो देने आए हो उसकी बात करो आजहम भुला चुके हैं उसको जो कल दिया तुमने</p>
<p>कवि: मारूफ आलम</p>

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Comments (3)

मारूफ आलम 15 Oct 2026

भाई ये गजल मेरी है इसे किसी और नाम से आपने शेयर किया है कृपया आप इसकी सही तहकीक करें गूगल पर मिल जायेगी मारूफ आलम के नाम से

मारूफ आलम 15 Oct 2026

मूल रचना ये है जो योरकोट एप्स पर 2020 मे प्रकाशित हुई है


गजल

मुहब्बतों को नफरतों मे बदल दिया तुमने
फिर इंसानियत का चेहरा कुचल दिया तुमने

हिंदू को मुसलमान से जब जब लड़ाना चाहा
होशियारी से दांव धर्म का चल दिया तुमने

जब भी आईना बन जाने को हुआ ये दिल
हर बार कोई रंग जफा का मल दिया तुमने

अब जो देने आए हो उसकी बात करो आज
हम भुला चुके हैं उसको जो कल दिया तुमने

हमने क्या पूछा था मुहब्बत मे तुमसे और
सवाल का हमारे ये क्या हल दिया तुमने

मारुफ आलम

हमारी आवाज़ 15 Oct 2026

हम आप से क्षमा चाहते हैं। तथा आपके नाम के साथ इसे प्रकाशित करने की इजाजत चाहते हैं

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